कबीर के दोहे




 दोहे

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।

गुरु और गोविन्द दोनों खड़े हैं, समझ में नहीं आता पहले किसे नमस्कार किया जाए? पहले गुरु को ही नमस्कार करना उचित है क्योंकि गुरु ने ही तो ईश्वर का ज्ञान करवाया है।

गुरु गोविन्द दोउ एक हैं, दूजा सब आकार।

आपा मेटैं हरि भजैं, तब पावैं दीदार।।

गुरु और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। दोनों एक ही हैं। बाहर से उन दोनों में भले ही अंतर है, पर अंदर से वे एक ही हैं। मन से ‘मैं’ की भावना निकालकर हरि को भजने से मन का सारा दोष मिट जाता है और तब हरि का दर्शन हो जाता है।

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।

गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।

गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता है और गुरु के बिना मोक्ष भी नहीं मिलता है। गुरु के बिना सत्य की पहचान नहीं होती है और गुरु के बिना मन का भ्रम भी दूर नहीं होता है।

गुरु समान दाता नहीं, याचक सीष समान।

तीन-लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान।।

गुरु के समान इस संसार में दाता नहीं है। शिष्य के समान कोई मांगने वाला भी नहीं है। गुरु तो ऐसा होता है कि तीनों लोकों का ज्ञान शिष्य को एक इशारे पर ही दे देता है।

गुरु सों ज्ञान जु लीजिए, सीस दीजिए दान।

बहुतक भोंदू बहि गये, राखि जीव अभिमान।।

गुरु से ज्ञान लेते समय अपना सिर उसके चरणों में झुका दीजिए। गुरु के सामने अकड़ दिखाने वाले बहुत से अज्ञानी बह गए और उनका कभी कल्याण नहीं हो सका।

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।

वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।

सभी ज्ञानी व्यक्ति गुरु और पारस पत्थर के अन्तर को समझते हैं। पारस पत्थर लोहा को सोना करता है और गुरु ज्ञान का बोध कराकर शिष्य को महान बना देता है।

गुरु शरणगति छाड़ि के, करै भरोसा और।

सुख सम्पत्ति को कह चली, नहीं नरक में ठौर।।

गुरु का साथ छोड़कर जो व्यक्ति दूसरों पर विश्वास करता है, उसको सुख-शांति तो मिलती नहीं, ऊपर से नरक के द्वार भी उसके लिए बन्द हो जाते हैं।

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।।

गुरु कुम्हार है और शिष्य एक कच्चा घड़ा है। कुम्हार घड़े को टिकाउ और अच्छा बनाने के लिए उसके अंदर हाथ डालकर बाहर से थपथपाता है। गुरु भी शिष्य को कुम्हार की तरह ठोक-पीटकर संसार में उसे एक आदरणीय व्यक्ति बना देता है। गुरु की प्रताड़ना स्वाभाविक है और वह शिष्य के हित में है।

गुरु को सिर पर राखिये चलिये आज्ञा माहि।

कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाहिं।।

गुरु को अपनो सिर का ताज समिझिए। गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले को तीनों लोकों में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।

कबीर हरि के रुठते, गुरु के शरणै जाय।

कहै कबीर गुरु रुठते, हरि नहि होत सहाय।।

हरि के रूठने पर गुरु की शरण में जाने पर बात बन जाती है लेकिन गुरु रूठ जाता है तो हरि कोई मदद नहीं करता है। गुरु को प्रसन्न रखना जरूरी है।

कबीर ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।

हरि के रुठे ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर।।

वे लोग अंधे हैं, जो गुरु को कोई महत्त्व नहीं देते। हरि के रूठने पर स्थान मिल सकता है, लेकिन गुरु के नाराज होने पर कहीं भी जगह नहीं मिल सकती है।

भक्ति पदारथ तब मिले, जब गुरु होय सहाय।

प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय।।

ईश्वर की भक्ति तभी मिल पाती है, जब गुरु की कृपा होती है। गुरु की अनुकम्पा के बिना भक्ति को प्राप्त करना बिल्कुल ही असंभव है।

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गयी गुरु ज्ञान।

सुमति गयी अति लोभते, भक्ति गयी अभिमान।।

सूर्य को देखते ही अंधकार गायब हो जाता है और गुरु-ज्ञान से दुर्बुद्धि चली जाती है। कबीर कहते हैं कि अति लोभ से सद्बुद्धि चली जाती है और अभिमान से भक्ति का नाश हो जाता है।

भाव बिना नहिं भक्त जग, भक्ति बिना नहिं भाव।

भक्ति-भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव।।

बिना भाव के संसार में किसी को भक्ति नहीं मिलती है। भक्ति के बिना मन में भाव नहीं उपजता है। भक्ति और भाव दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों का ही स्वभाव एक जैसा है।

कामी क्रोधी लालची, इनते भक्ति ना होय।

भक्ति करै कोई सूरमा, जादि बरन कुल खोय।

कबीर कहते हैं‒कामी, क्रोधी और लालची प्रवृत्ति के व्यक्ति से भक्ति नहीं होती है। भक्ति तो वही कर सकता है, जो अपने खानदान, परिवार, जाति तथा अहंकार को त्याग देता है और यह हर किसी के वश की बात नहीं है।

देखा देखी भक्ति का, कबहू न चढ़सी रंग।

विपत्ति पड़े यों छाड़सि, केचुलि तजसि भुजंग।।

दूसरों को भक्ति करते हुए देखकर भक्ति नहीं हो सकती। ऐसी भक्ति करने वाले मुसीबत पड़ने पर उसी तरह से भक्ति का त्याग कर देते हैं जैसे सर्प केंचुल का त्याग कर देता है।

भक्ति भक्ति सब कोई कहै, भक्ति न जाने भेद।

पूरण भक्ति जब मिलै, कृपा करै गुरुदेव।।

भक्ति-भक्ति तो हर कोई कहता है लेकिन भक्ति का अर्थ कोई नहीं जानता। पूर्ण रूप से भक्ति तभी प्राप्त होती है जब गुरुदेव की कृपा होती है।

कबीर या संसार की, झूठी माया मोह।

जिहि घर जिता बधावना, तिहि घर तेता दोह।।

यह सांसारिक मोह-माया सब झूठ है। जिस घर में जितनी ही दौलत और सुख-सुविधा है, वहां पर उतना ही दुःख है।

कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खंड।

सदगुरु की किरपा भई, नातर करती भांड।।

माया बहुत ही मोहिनी है और वह भी मीठी खांड की तरह मोहिनी है, जो इसमें उलझ गया, वह जल्दी बाहर नहीं आ पाता। वह तो सद्गुरु की कृपा हुई कि हम माया के मोहपाश में नहीं बंधे।

माया छाया एक सी, बिरला जानै कोय।

भगता के पीछे फिरै, सनमुख भाजै सोय।।

माया और छाया दोनों एकसमान हैं। इस बात से कम लोग ही वाकिफ हैं। ये दोनों ही भक्तजनों के पीछे-पीछे और कंजूसजनों के आगे-आगे भागती फिरती हैं। इन्हें कोई छू तक भी नहीं सकता।

माया दोय प्रकार की, जो कोय जानै खाय।

एक मिलावै राम को, एक नरक ले जाय।।

माया के दो रूप हैं। जब व्यक्ति इसका इस्तेमाल देव कार्य के लिए करता है तो उसका भला होता है और माया के दूसरे रूप यानी आसुरी प्रवृत्ति का सहारा लेता है तो उसका जीवन नरक बन जाता है।

मोटी माया सब तजैं, झीनी तजी न जाय।

पीर पैगम्बर औलिया, झीनी सबको खाय।।

मोटी माया यानी धन, पुत्र, स्त्री, घर आदि का त्याग तो आदमी कर देता है, पर झीनी माया यानी रूप, यश, सम्मान आदि का त्याग नहीं कर पाता है और यह झीनी यानी छोटी माया ही सारे दुखों की जननी है।

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि माहि परन्त।

कोई एक गुरु ज्ञानते, उबरे साधु सन्त।।

माया दीपक की लौ है और मनुष्य पतंग की तरह है, जो बार-बार उस पर आकर मंडराता है। माया के इस भ्रमजाल से कोई बिरला ही स्वयं को मुक्त करा पाता है।

काल हमारे संग है, कस जीवन की आस।

दस दिन नाम संभार ले, जब लग पिंजर सांस।।

कबीर कहते हैं कि जब काल आठों पहर हमारे साथ है तो फिर जीने की यह उम्मीद कैसी? यह जीवन मिथ्या है। जब तक शरीर में प्राण है, अपना इहलोक-परलोक संवार लो। जब काल आ जाएगा तब यह मौका नहीं मिलेगा।

जंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय।

ते भी होते मानवी, करते रंग रलियाय।।

जब निधन हो जाता है तब मरे हुए शरीर को जला दिया जाता है। बस मृत शरीर के स्थान पर राख की ढेरी रह जाती है, जिस पर समय के साथ हरी घास उग जाती है। वे भी तो कभी मनुष्य ही थे, जो हास-परिहास और रंग-विलास में डूबे रहते थे, आज उनके मृत शरीर की राख पर घास उग आई है। जीवन के इस मर्म को जानो।

हरिजन आवत देखि के, मोहड़े सूख गयो।

भाव भक्ति समुझयो नहीं, मूरख चूकि गयो।।

भगवान के भक्तों को सामने देखकर जिसके मुंह सूख गए अर्थात् उसके मन में कोई खुशी उत्पन्न नहीं हुई, ऐसे व्यक्ति को तो मूर्ख ही कहा जाएगा। समझो उसने एक अच्छा मौका हाथ से जाने दिया।

दीपक सुन्दर देखि करि, जरि जरि मरे पतंग।

बढ़ी लहर जो विषय की, जरत न मारै अंग।।

दीपक की सुन्दर लौ को देखकर कीट-पतंग जल-जलकर मर जाते हैं। यही स्थिति कामी पुरुष की है। विषय-वासना की लौ की खूबसूरती में उलझकर वह भी नाना प्रकार के दुःखों को भोगता है और एक दिन वह भी वासना की लौ में जल मरता है।

कबीर गुरु के देश में, बसि जानै जो कोय।

कागा ते हंसा बनै, जाति वरन कुल खोय।।

गुरु के देश में जो रहता है यानी गुरु की कृपा जिस पर बरसती है और जो गुरु का कहना मानता है, वह कौआ से हंस बन जाता है यानी उसके मन के सारे मैल धुल जाते हैं और यशस्वी बन जाता है।

गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।

लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल।।

जो व्यक्ति गुरु की आज्ञा को नहीं मानता है और मनमानी करता है, लोक-परलोक दोनों ही उसके बिगड़ जाते हैं और वह सदा ही दुःखों से घिरा रहता है।

गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय।

कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय।।

जो व्यक्ति गुरु की आज्ञा लेकर आता है और गुरु की आज्ञा लेकर जाता है, उससे गुरु बहुत ही प्रेम करते हैं और सुख-समृद्धि रूपी अमृत रस का हमेशा वह पान करता है।

प्रीति पुरानी न होत है, जो उत्तम से लाग।

सो बरसां जल में रहै, पथर न छोड़े आग।

उत्तम स्वभाव वाले व्यक्ति से प्रेम हो जाए तो वह कितना भी पुराना हो जाए प्रेम में कोई कमी नहीं आती है जैसे पत्थर सैकड़ों साल पानी में रहने पर भी आग उत्पन्न करने की क्षमता को नहीं छोड़ता है।

प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय।

उत्तम प्रीति सो जानियो, सतगुरु से जो होय।।

संसार में प्रेम के कई रंग-रूप हैं और वह नाना प्रकार का होता है लेकिन उत्तम प्रेम वही है, जो सद्गुरु से होता है। इस प्रेम के परिणाम सदा अच्छे ही होते हैं।

साधु संगत परिहरै, करै विषय को संग।

कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग।।

जो व्यक्ति बुद्धिमानों का साथ छोड़कर दुर्जनों यानी मूर्खों की सोहबत में रहता है, वह उन मूर्खों की ही श्रेणी में आ जाता है, जो गंगाजल को छोड़कर कुआं खुदवाते हैं।

कामी का गुरु कामिनी, लोभी का गुरु दाम।

कबीर का गुरु सन्त है, संतन का गुरु राम।।

जो लोग कामी होते हैं, उनका सब कुछ सुन्दर स्त्री होती है, जो लोभी होते हैं, उनका सब कुछ दाम यानी धन होता है लेकिन अच्छे लोगों का गुरु सज्जन व्यक्ति होते हैं और संतों का गुरु ईश्वर होता है।

परारब्ध पहिले बना, पीछे बना शरीर।

कबीर अचम्भा है यही, मन नहिं बांधे धीर।।

कबीर कहते हैं कि प्रारब्ध पहले बना, उसके बाद यह शरीर बना लेकिन आश्चर्य है कि मन को थोड़ा-सा भी धैर्य नहीं है। वह सब कुछ जानता है, फिर भी उसे संतोष नहीं है।

जहां काम तहां नाम नहिं, जहां नाम नहिं काम।

दोनों कबहू ना मिलै, रवि रजनी इक ठाम।।

जहां कामरूपी वासना होती है, वहां ज्ञान और ईश्वर दोनों ही नहीं होते और जहां ज्ञान होता है, वहां कामरूपी वासना का वास नहीं होता। काम और सद्गुरु जैसे एक साथ नहीं हो सकते वैसे ही सूर्य और रात एक स्थान पर नहीं मिल सकते।

कबीर कमाई आपनी, कबहुं न निष्फल जाय।

सात समुद्र आड़ा पड़े, मिलै अगाड़ी आय।।

कबीर कहते हैं कि मेहनत की कमाई कभी भी बेकार नहीं जाती, चाहे सात समुद्र उसके सामने क्यों न आ जाएं अर्थात् परिश्रम का फल सदा ही मीठा ही होता है।

दीन गरीबी बंदगी, साधुन सों आधीन।

ताके संग मैं यौ रहूं, ज्यौं पानी संग मीन।।

जिसमें सहनशीलता, सेवाभाव, प्रेमभाव तथा साधु के साथ रहने की आदत है, उसके साथ हमें वैसे रहना चाहिए जैसे पानी के साथ मछली रहती है।

दया धर्म का मूल है, पाप मूल संताप।

जहां क्षमा वहां धर्म है, जहां दया वहां आप।।

कबीर कहते हैं‒दया धर्म की जड़ है और पाप दुःखों की जड़ है। जहां पर क्षमाभाव है, वहीं पर धर्म है, जहां दया है, वहीं पर ईश्वर का वास है।

धरती फाटै मेघ मिलै, कपड़ा फाटै डौर।

तन फाटै को औषधि, मन फाटै नहिं ठौर।

धरती में अगर दरारें पड़ जाती हैं तो बारिश होने पर वे दरारें मिट जाती हैं। कपड़ा फट जाता है तो सिलाई करने पर जुड़ जाता है। तन फाटे यानी शरीर बीमार पड़ जाता है तो दवा से स्वस्थ हो जाता है लेकिन मन फट जाता है तो कोई भी उपाय काम नहीं करता है।

माली आवत देखि के, कलियां करे पुकार।

फूली फूली चुन लई, काल हमारी बार।।

कबीर कहते हैं‒माली के आते हुए देखकर कलियां पुकारने लगीं। जो कलियां खिली हुई थीं, उन्हें माली ने तोड़ लिए और जो खिलने वाली हैं, उनकी कल बारी है। जीवन की भी गति यही है, जिसकी उम्र पूरी हो गयी है, वह काल के मुंह में समा जाता है और जिसकी उम्र पूरी नहीं होती उसकी बारी अगले दिन होती है।

जरा कुत्ता जोबन ससा, काल अहेरी नित्त।

दो बैरी बिच झोंपड़ा, कुशल कहां सो मित्त।।

कबीर कहते हैं‒बुढ़ापा कुत्ता के समान तथा जवानी खरगोश के समान है। जवानी रूपी खरगोश पर बुढ़ापा रूपी कुत्ता घात लगाए बैठा है। हे प्राणी! बुढ़ापा और काल इन दो दुश्मनों के बीच तुम्हारा झोंपड़ा है, तुम्हारा कुशल नहीं है। तुम चाहकर भी अपनी रक्षा नहीं कर सकते।

कबीर माया बेसवा, दोनूं की इक जात।

आंवत को आदर करैं, जात न बूझै बात।।

कबीर कहते हैं‒माया और वेश्या इन दोनों की एक जाति है। आने वालों का स्वागत करती हैं और जाने वालों से बात भी नहीं करती हैं।

कामी अमी न भावई, विष को लेवै सोध।

कुबुधि न भाजै जीव की, भावै ज्यौं परमोध।।

कामी पुरुष को उपदेश अच्छा नहीं लगता। वह हमेशा काम रूपी जहर की तलाश में रहता है। मन की चंचलता उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देती है, जिससे वह अच्छी बातों को अपना नहीं पाता है ।

जाका गुरु है आंधरा, चेला खरा निरंध।

अनेधे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।।

अगर गुरु अज्ञानी है तो शिष्य ज्ञानी कैसे हो सकता हैं। अन्धे को मार्ग दिखाने वाला अगर अंधा मिल जाए तो सही मार्ग कैसे दिखाएगा? ऐसे गुरु-चेले समय के फंदे में फंसकर अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं।

माला तिलक लगाय के, भक्ति न आई हाथ।

दाड़ी मूंछ मुंडाय के चले चुनी के साथ।।

माला गले में डाल ली और माथे पर तिलक भी लगा लिया लेकिन भक्ति प्राप्त नहीं हुई। मूंछ-दाढ़ी मुंडवा ली और दुनिया के संग चल दिए, फिर भी कोई लाभ नहीं अर्थात् आडंबर से भक्ति नहीं मिलती। यह तो दुनिया को धोखा देना है। भक्ति तो मन से पैदा होती है।

मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग।

तासों तो कौवा भला, तन मन एकहिं अंग।।

कबीर कहते हैं कि मन मैला है और तन उजला है तो वह बगुले के समान कपटी है, इससे अच्छा तो कौवा ही है, उसका तन-मन दोनों ही एक ही रंग में रंगा है।

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा परजा सो रुचै, शीश देय ले जाय।।

कबीर कहते हैं कि प्रेम खेतों में पैदा नहीं होता और न प्रेम बाजार में बिकता है। राजा, प्रजा जिस किसी को भी अच्छा लगे, वह अपनी सिर देकर ले जाए। प्रेम कोई वस्तु नहीं कि इसका व्यापार किया जाए।

तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय।

सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय।।

नाना प्रकार से शरीर को सजाकर कोई भी योगी बन सकता है लेकिन मन की चंचलता को अपनी मुट्ठी में कर कोई भी योगी नहीं बनता। मन पर संयम पाकर अगर कोई योगी बन जाए तो रूप बदलने की जरूरत नहीं है। उसे सारी सिद्धियां आसानी से ही मिल जाएंगी।

मांग गये सो मर रहे, मरै जु मांगन जाहिं।

तिनतैं पहले वे मरे, होत करत हैं नाहिं।।

कबीर कहते हैं कि जो किसी से कुछ मांगने गया, समझो वह जिंदा ही मर गया और जिसने रहते हुए भी मना कर दिया वह मांगने वाले से भी पहले मर गया।

पढ़ि पढ़ि के पत्थर भये, लिखि भये जुईंट।

कबीर अन्तर प्रेम का लागी नेक न छींट।।

कबीर कहते हैं कि पढ़-पढ़कर पत्थर बन गए और लिख-लिखकर ईंट के समान सख्त हो गए लेकिन हृदय में प्रेम की छींट भी न लगी अर्थात् इस पढ़ने और लिखने से क्या लाभ जब प्रेम का अर्थ भी नहीं जान सके।

शब्द जु ऐसा बोलिये, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे, आपन को सुख होय।।

कबीर कहते हैं‒ऐसा वचन बोलिए, जिसमें जरा-सा भी अहं भाव न हो और सामने वाला प्रफुल्लित हो जाए तथा स्वयं को भी सुख दे।

जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय।

सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय।।

यंत्र-मंत्र सब झूठ है। संसार का कोई भी आदमी इनके चक्कर में न आए। सच्चे ज्ञान के बिना कौआ कभी हंस नहीं बन सकता अर्थात् नीम हकीम से बचें। वह कभी भी ज्ञानी नहीं हो सकता।

मन मोटा मन पातरा, मन पानी मन लाय।

मन के जैसी ऊपजै, तैसी ही हवै जाय।।

कबीर कहते हैं‒मन की गति निराली है। मन कभी बहुत शक्तिशाली हो जाता है, कभी पानी की तरह शीतल बन जाता है और कभी आग के समान तपती भट्टी बन जाता है। जैसे हालात होते हैं, मन वैसा ही बन जाता है। मन से बड़ा बहुरूपिया कोई नहीं है।

झूठा सब संसार है, कोऊ न अपना मीत।

राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत।।

कबीर कहते हैं‒यह संसार झूठा है और यहां पर कोई भी अपना नहीं और न कोई दोस्त है। राम के नाम के महत्त्व को जो जान लेता है, वह भवसागर को पार कर जाता है। यहां बस राम का नाम ही ‘सत्य’ है।

बिरछा कबहुं न फल भखै, नदी न अंचवै नीर।

परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर।।

पेड़ कभी भी अपना फल नहीं खाते हैं और न नदी कभी अपना पानी पीती है। ये दोनों ही सदा दूसरों की सेवा करते हैं, वैसे ही जैसे परमार्थ के लिए साधु ने शरीर धारण किया हुआ है। जो संत होते हैं, उनका जीवन दूसरों के लिए होता है।

आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह।

यह तीनों तबही गये, जण्बहिं कहा कछु देह।।

कबीर कहते हैं कि इज्जत चली गई, आदर चला गया और आंखों से स्नेह भाव चले गए। ये तीनों तब ही चले गए जब कहा कि कुछ दो। अर्थात् भीख मांगना सब से निकृष्ट कार्य है।

कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय।

दुरमति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय।।

सज्जन लोगों के साथ रोजाना ही उठिए-बैठिए। उनकी सोहबत में रहने से दुर्गुण चले जाते हैं और सद्गुण आ जाते हैं।

कागा काको धन हरै, कोयल काको देत।

मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनो करि लेत।।

कबीर कहते हैं कि कौआ किसी का धन नहीं छीनता और कोयल किसी को कुछ देती नहीं है; लेकिन मीठी आवाज में कूक कर सारे संसार को अपना बना लेती है। हमेशा मीठी आवाज में बोलें।

राजपाट धन पायके, क्यों करता अभिमान।

पड़ोसी की जो दशा, भई सो अपनी जान।।

कबीर कहते हैं कि राजपाट और धन प्राप्त कर अभिमान क्यों करता है। तेरे पड़ोसी की जो दुर्गति हुई, वही तेरी भी होगी, तू इतना जान लें। कहने का भाव है कि तेरी भी मौत निश्चित है।

सांच कहूं तो मारि हैं, झूठै जग पतियाय।।

यह जगकाली कूतरी, जो छेड़ै तो खाय।।

कबीर कहते हैं कि सत्य बोलने पर लोग काट खाने को दौड़ते हैं और झूठ बोलने पर विश्वास कर लेते हैं। यह संसार काटने वाली कुतिया की तरह ही है, जो उसे छेड़ता है, उसे ही काट लेती है। कबीर संसार को काली कुतिया मानते हैं। मनुष्य को सांसारिक चीजों से बचना चाहिए।

ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सो हेत।

सत्यवान परमार थी, आदर भाव हेत।।

कबीर कहते हैं कि जो ज्ञानी होते हैं, वे घमंडी नहीं होते हैं। उनके मन में सबके हित के भाव होते हैं। वे सदा सत्य के मार्ग पर चलते हैं और दूसरों का भला सोचते हैं।

प्रेम पियाला सो पिये, शीश दच्छिना देय।

लोभी शीश न दे सकै, नाम प्रेम का लेय।।

कबीर कहते हैं कि प्रेम-अमृत का पान वही कर सकता है, जो दक्षिणा के रूप में अपना शीश काटकर भेंट करने की शक्ति रखता है। लोभी व्यक्ति शीश काटकर नहीं देता लेकिन नाम प्रेम का लेता है।

कबीर क्षुधा है कूतरी, करत भजन में भंग।

वांकू टुकड़ा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग।।

कबीर कहते हैं कि भूख कुतिया की तरह ही है, जो भजन में विघ्न डालती है। उसके सामने रोटी का टुकड़ा फेंककर तब ईश्वर वंदना करो।

हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार।

हारा तो हरि सों मिले, जीता जम के द्वार।।

गृहस्थी लोग जिस जीत को जीत और जिस हार को हार समझते हैं, भगवान के भक्त उनसे अलग सोचते हैं। सत्य की राह पर चलने वाले उस पराजय को उस जीत से अच्छा मानते हैं, जो बुराई की तरफ ले जाती है। इस संसार में विनम्रता में ही जीत है।

जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़ै दाम।

दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।।

कबीर कहते हैं कि नाव में पानी भर जाए और घर में धन आ जाए तो दोनों हाथ से उलीचें अर्थात् खुले दिल से दान-पुण्य का कार्य करें। बुद्धिमान लोगों की यही पहचान है।

बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल।

आवन जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी की नाल।।

कबीर कहते हैं कि बेटा के जन्म लेने पर तूने थाल बजाया, खुशियां मनाई। यह प्रसन्नता किसलिए? यह आना-जाना तो लगा हुआ ही है जैसे चीटियों की कतार आती-जाती रहती है।

सहज मिलै सो दूध है, मांगि मिलै सो पानि।

कहैं कबीर वह रक्त है, जामें ऐंचातानि।।

कबीर कहते हैं कि जो सहजता से प्राप्त हो जाए वह दूध के समान है, जो मांगने पर मिले, वह पानी के समान है और जो जोर-जबर्दस्ती से किसी को दुःख पहुंचाकर प्राप्त हो, वह खून के समान है।

शब्द सम्हारे बोलिये, शब्द के हाथ न पांव।

एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव।।

मुंह से जो भी शब्द निकालो सोच-समझकर निकालो क्योंकि शब्द के हाथ-पांव नहीं होते। यही शब्द कहीं दवा बन जाता है और कहीं पर जख्म पैदा कर देता है।

यह तन कांचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ।

टपका लागा फुटि गया, कछू न आया हाथ।।

कबीर कहते हैं‒यह शरीर मिट्टी के कच्चे घड़े के समान है, जिसे बड़े शौक से आप अपने साथ लिए फिरते हैं। काल का एक ही पत्थर लगने पर यह मिट्टी का शरीर रूपी घड़ा फूट जाता है और हाथ में कुछ भी नहीं लगता है। कहने का आशय है कि इस शरीर पर गुमान करने की कोई जरूरत नहीं है।

जिभ्या जिन बस में करी, तिन बस कियो जहान।

नहिं तो औगुन उपजे, कहि सब संत सुजान।।

जिसने जीभ को अपने वश में कर लिया, उसने सारा संसार अपने वश में कर लिया। जिसकी जीभ वश में नहीं होती है, उसके शरीर व मन में हजारों दोष उत्पन्न हो जाते हैं, ज्ञानी जनों का ऐसा कहना है।

बहुत जतन करि कीजिए, सब फल जाय न साय।

कबीर संचै सूम धन, अन्त चोर लै जाय।।

कबीर कहते हैं कि संग्रह किया गया धन अंत में नष्ट हो जाता है। धन की यही गति है जैसे कंजूस का संग्रह किया हुआ धन अन्त में चोर चुरा ले जाते हैं यानी वह धन उसके किसी काम नहीं आता है।

कबीर औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं।

तीन लोक की सम्पदा कब आवै घर माहिं।।

कबीर कहते हैं कि मनुष्य की औंधी खोपड़ी यानी अतृप्त मन कभी भी धन से तृप्त नहीं होता है, लोभी व्यक्ति यही चाहता है कि तीनों लोकों का धन उसके घर में आ जाए। कहने का भाव है कि जिसके पास जितना ही धन है उतना ही धन और चाहता है।

माला तिलक तो भेष है, राम भक्ति कुछ और।

कहैं कबीर जिन पहिरिया, पांचों राखै ठौर।।

कबीर कहते हैं कि माला धारण करना और तिलक लगाना तो महज एक रूप बदलना है, इसे बाहरी आडंबर ही कहा जाएगा। राम भक्ति तो कुछ और है। जिसने राम नाम की माला पहन ली, वह अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है और राम मय उसका पूरा जीवन हो जाता है।

करता था तो क्यौं रहा, अब करि क्यौं पछताय।

बोवै पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय।।

जब तू बुरे कर्मों को करता था और समझाने पर भी नहीं समझता था तो अब क्यों अफसोस कर रहा है? बबूल का पेड़ जब तूने बोया है तो आम के फलों का मीठा स्वाद कहां से पाएगा अर्थात् कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है।

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं।

प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।।

जब मेरे अंदर अहंकार था तब मुझे गुरु नहीं मिले और अब गुरु मिल गए हैं तो मेरे अंदर अहंकार नहीं है। कबीर कहते हैं कि प्रेम की गली इतनी छोटी और संकरी होती है कि उसमें एक साथ दो नहीं रह सकते यानी ज्ञान और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते।

कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल।

आदि अंत मधि सोधिया, दूजा देखा काल।।

कबीर कहते हैं कि ईश्वर का भजन, कीर्तन ही सार है और बाकी सब झूठा है। आदि, अंत और मध्य के बारे में सब सोच-विचार लिया है। भजन, कीर्तन के अलावा शेष सब समय के चक्र में उलझे हुए हैं।

तन मन ताको दीजिए, जाको विषया नाहिं।

आपा सब ही डारि के, राखै साहिब माहिं।।

अपना तन-मन उस गुरु को दो, जो विषय-विकार से दूर हो। जिसमें जरा-सा भी अहं भाव न हो और ईश्वर का पूर्ण ज्ञान हो अर्थात् जो सांसारिकता से दूर और ईश्वर के करीब हो।

अधिक सनेही माछरी, दूजा अलप सनेह।

जबहि जलते बीछुरै, तब ही त्यागै देह।।

कबीर कहते हैं कि मछली का पानी से प्रेम सबसे अधिक होता है। उसके जैसा प्रेम दुनिया में बहुत कम ही देखने को मिलता है। मछली जल से अलग होते ही अपनी देह का त्याग कर देती है।

ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय।

कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।

सफेद कपड़े धारण करना और पान-सुपारी खाना, यह दिखावा और बेकार है। संत कबीर कहते हैं कि सदगुरु की भक्ति के बिना, वह बंधा हुआ यमपुर जाता है अर्थात् ईश्वर की भक्ति ही मनुष्य का असली पहनावा है।

बालपन भोले गया, और जुवा महमंत।

वृद्धपने आलस गयो, चला जरन्ते अन्त।।

कबीर कहते हैं कि बालपन खेलने-कूदने में बीत गया और जवानी आई तो वासनाओं में लिप्त हो गया, फिर बुढ़ापा आया तो आलस में ही बीत गया, अचानक ही मृत्यु हो गई और शरीर चिता पर जला दिया गया अर्थात् जीवन का अंत यही है। हे प्राणी! जीवन के इस मर्म को जानो।

चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावै हंस।

ते मुक्ता कैसे चुंगे, पड़े काल के फंस।।

चाल बगुले की है और खुद को हंस कहते हैं। ऐसा मूर्ख भला कैसे मोती को चुग सकता है। ऐसे प्राणी जीवन-मरण के चक्र में फंसे ही रहते हैं। उन्हें मोक्ष कभी नहीं मिलता।

कहता हूं कहि जात हूं, कहूं बजाये ढोल।

श्वासा खाली जात है, तीन लोक का मोल।।

कबीर ढोल पीट-पीट कर कह रहे हैं कि भजन के बिना एक-एक सांस खाली जा रही है। भजन करो। भजन के बिना जीवन बेकार है। जो सांसें ले लीं, वे वापस नहीं आएंगी। अब भी समय है। प्रभु का भजन करो।

मांगन को भल बोलनो, चोर न को भल चूप।

माली को भल बरसनो, धोबी को भल धूप।।

भिक्षुक के लिए बोलना अच्छा है, बोलने पर ही उसे भीख मिलेगी। चोर के लिए चुप रहना अच्छा है। माली के लिए बारिश अच्छी है और धोबी के लिए धूप अच्छी है।

कबीर मन्दिर लाख का, जड़िया हीरा लाल।

दिवस चारि का पेखना, विनशि जायेगा काल।।

यह शरीर लाख के बने मंदिर के समान है, जिसमें सौंदर्य रूपी हीरे, पन्ने और लाल जड़े हुए हैं लेकिन यह सौंदर्य क्षणिक है। इसे समय के साथ एक दिन नष्ट होना ही है।

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं।

धन का भूखा जो फिरै , सो तो साधू नाहिं।।

कबीर कहते हैं कि साधु भाव का भूखा होता है, उसे धन की इच्छा नहीं होती लेकिन जो साधु धन का भूखा होता है, वह वास्तव में साधु नहीं है।

कुलवंता कोटिक मिले, पंडित कोटि पचीस।

सुपच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश।।

कबीर कहते हैं कि उत्तम कुल के करोड़ों लोग मिलें, शास्त्र ज्ञान रखने वाले चाहे पचीस करोड़ मिलें लेकिन भक्त चाहे निम्न कुल का ही क्यों न हो, उसके पांव के जूते में किसी का सिर नहीं तोला जा सकता अर्थात् भक्त सबसे बड़ा है। उसके सामने सब झूठे हैं।

मथुरा काशी द्वारिका, हरिद्वार जगन्नाथ।

साधु संगति हरिभजन बिन, कछु न आवै हाथ।।

मथुरा, काशी, द्वारिका, हरिद्वार, जगन्नाथ आदि तीर्थों का तीर्थाटन करने से कुछ नहीं मिलता। अच्छे लोगों के साथ और ईश्वर के भजन के बिना कुछ भी हाथ न लगने वाला। कहने का आशय है कि तीर्थाटन में कुछ नहीं रखा, सज्जनों की संगति और हरिभजन ही मुक्ति का साधन है।

कबीर संगति साधु की, जो करि जाने कोय।

सकल विरछ चन्दन भये, बांस न चन्दन होय।।

कबीर कहते हैं कि जो सज्जनों के साथ रहते हैं, और जो सत्संग करते हैं, वे ही उनके गुणों से वाकिफ होते हैं। जैसे चंदन के साथ रहने वाले सारे पेड़-पौधे चन्दन का स्वभाव ग्रहण तो कर लेते हैं, पर बांस बांस ही रहता है क्योंकि वह अंदर से खोखला और ऊपर से सख्त होता है अर्थात् अभिमानी व्यक्ति पर सत्संग का कोई असर नहीं होता।

माला फेरत युग गया, मिटा न मन का फेर।

कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।

माला फेरते हुए युग बीत गया लेकिन मन का फेर नहीं मिटा यानी सांसारिक विषयों से मोह भंग नहीं हुआ। कबीर कहते हैं कि हाथ की माला छोड़ दो और मन का मनका फेरो अर्थात् अपने मन को शुद्ध करो और अच्छा सोचो। मन अशुद्ध है और माला फेर रहे हो, भला इससे क्या प्राप्त होने वाला है? कुछ भी तो नहीं।

यह तन कांचा कुंभ है, चोट चहं दिस खाय।

एकहिं गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय।।

कबीर कहते हैं कि यह शरीर मिट्टी के बने कच्चे घड़े के समान है, जो चारों तरफ से चोट (दुःख, रोग, तनाव) खाता है। बस सद्गुरु के नाम का सुमिरन न करने के कारण यह लाखों कष्ट पा रहा है। भजन करो, इस शरीर को एक दिन तो मिट्टी में मिल जाना ही है।

कबीर चंदन पर जला, तीतर बैठा माहिं।

हम तो दाझत पंख बिन, तुम दा जत हो काहि।।

कबीर कहते हैं कि चंदन का पेड़ आग में जल रहा था, तभी एक तीतर उस पर आकर बैठ गया। पेड़ से चुप रहा न गया। वह बोला‒हे तीतर, हम तो पंखहीन हैं, इसलिए जल रहे हैं, लेकिन तुम तो पंखवाले हो, उड़ सकते हो, फिर क्यों जल रहे हो? दुनिया में ऐसे लोग भी हैं, जो समर्थवान होकर भी कष्ट भोग रहे हैं।

गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।

दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नांव।।

गुरु लोभी है और शिष्य लालची है, दोनों अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए दांव खेल रहे हैं, भला ऐसे गुरु-शिष्य का कल्याण कैसे हो सकता है। उन्हें तो अज्ञान रूपी पत्थर की नाव पर सवार होकर डूब मरना ही है। वे भवसागर को पार नहीं कर सकते।

सब धरती कागद करूं, लिखनी सब बनराय।

सात समुद्र का मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।।

सारी धरती को कागज मान लें, जंगल की लकड़ियों की कलम बना लें और सातों समुद्रों के जल की स्याही बना लें, फिर भी गुरु के गुणों को लिखा नहीं जा सकता है। गुरु का ज्ञान अपरिमित है और अवर्णनीय है।

गुरु गुरु में भेद है, गुरु गुरु में भाव।

सोइ गुरु नित बन्दिये, शब्द बतावे दाव।।

कबीर गुरु का भेद बताते हुए कह रहे हैं कि गुरु गुरु में अंतर है और विचारों में भी अंतर है। सब के अलग-अलग विचार होते हैं। वही गुरु वंदनीय है, जो सार-शब्द का ज्ञान करवाए और परमात्मा के नजदीक ले जाए।

माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर।

आशा तृष्णा न मरी, कह गये दास कबीर।।

कबीर कहते हैं कि समय के साथ-साथ शरीर, मन, माया सब मर जाते हैं लेकिन मन में उत्पन्न होने वाली आशा और तृष्णा कभी नहीं मरतीं। मोह और तृष्णा को मारना ही सदज्ञान को प्राप्त करने के बराबर है।

दस द्वारे का पींजरा, तामे पंछी मौन।

रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन।।

दस द्वारों के शरीर रूपी पिंजरा में प्राणवायु रूपी पक्षी चुपचाप रहता है और सारे सुखों का आनंद लेता है। यदि वह प्राण वायु रूपी पक्षी दस द्वारों में से किसी एक द्वार से निकल जाए तो इसमें अचरज की क्या बात है? आश्चर्य की बात तो यह है कि वह दस द्वार वाले पिंजरे में कैसे रहा, उड़ा क्यों नहीं?

नींद निशानी मौत की, उठो कबीरा जाग।

और रसायन छोड़ के, नाम रसायन लाग।।

नींद मौत की निशानी है। कबीर कहते हैं कि हे मन, जाग और नींद का परित्याग कर हरिभजन कर। तू यहां सोने के लिए नहीं आया है।

कबिरा संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।

खीर खांड़ भोजन मिले, ताकर संग न जाय।।

कबीर कहते हैं कि अच्छे लोगों के साथ जौ की भूसी खाकर भी रहना पड़े तो रहना चाहिए लेकिन दुर्जन व्यक्ति के साथ खीर-पकवान भी खाने को मिले तो नहीं रहना चाहिए।

आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर।

एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बांधि जंजीर।।

कबीर कहते हैं कि जो इस संसार में आया है, उसे तो एक दिन जाना ही है चाहे वह राजा हो, भिखारी हो या फकीर हो। जो अच्छा कर्म करता है, वह सिंहासन पर चढ़कर जाता है और जिसका कर्म बुरा है, वह जंजीरों में बंधकर जाता है। इस संसार में तो कर्म ही प्रधान है। हे प्राणी! कर्म की महिमा को समझो।

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।

दुइ पट भीतर आइके, साबुत गया न कोय।।

चलती हुई चक्की देखकर कबीर ने रो दिया। चक्की के दोनों पाटों के बीच आकर साबुत कोई न बचा अर्थात् इस संसार रूपी चक्की में सबको पिसना ही है।

सांई ते सब होत है, बन्दे से कुछ नाहिं।

राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं।।

कबीर कहते हैं कि ईश्वर कुछ भी करने में सक्षम है। मनुष्य के वश में कुछ भी नहीं है। वह सर्वशक्तिमान ईश्वर राई को पर्वत बना सकता और पर्वत को राई के समान छोटा बना सकता है।

मोर तोर की जेवरी, गल बंधा संसार।

दास कबीर क्यों बंधै, जाके नाम आधार।।

मेरा-तेरा, अपना-पराया आदि भावों रूपी रस्सी से इस संसार के लोगों का गला बंधा हुआ है लेकिन कबीर जैसे ज्ञानी पुरुष इस रस्सी से क्यों बंधे? उसे तो सद्गुरु के नाम का सहारा मिल गया है।

कबीर गर्व न कीजिए, रंक न हंसिये कोय।

अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय।।

कबीर कहते हैं कि अपने सुख-संपदा पर घमंड न करो और किसी गरीब की गरीबी पर न हंसो। तुम्हें नहीं पता तुम्हारी नाव भवसागर में डोल रही है। क्या पता कब क्या हो जाए, समय का कुछ पता नहीं। कहने का तात्पर्य है कि दूसरों की बेबसी पर हंसने से पहले यह देख लें कि आप क्या हैं। आप भी तो एक इंसान ही हैं। हादसा तो आपके साथ भी हो सकता है।

न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन का मैल न जाय।

मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाय।

कबीर कहते हैं कि नहाने-धोने से क्या हुआ, जब मन का मैल ही न धुला। मछली हमेशा जल में रहती है और लाख धोने पर भी उसकी दुर्गंध नहीं जाती है।

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